अध्याय 1, श्लोक 11 (भगवद् गीता 1.11)
संस्कृत श्लोक
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः। भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि
लिप्यंतरण
ayaneṣhu cha sarveṣhu yathā-bhāgamavasthitāḥ bhīṣhmamevābhirakṣhantu bhavantaḥ sarva eva hi
शब्दार्थ
ayaneṣhu—at the strategic points; cha—also; sarveṣhu—all; yathā-bhāgam—in respective position; avasthitāḥ—situated; bhīṣhmam—to Grandsire Bheeshma; eva—only; abhirakṣhantu—defend; bhavantaḥ—you; sarve—all; eva hi—even as
अनुवाद
विभिन्न मोर्चों पर अपने-अपने स्थान पर स्थित रहते हुए आप सब लोग भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।
अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक उस मानसिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ अहंकार अपने पुराने संस्कारों और मान्यताओं, जिन्हें भीष्म के रूप में दिखाया गया है, की रक्षा करने का प्रयास करता है। यह उस भय को प्रकट करता है जो आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया में पुरानी पहचानों के खोने के प्रति सचेत है।