अध्याय 1, श्लोक 37 (भगवद् गीता 1.37)
संस्कृत श्लोक
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव
लिप्यंतरण
tasmān nārhā vayaṁ hantuṁ dhārtarāṣhṭrān sa-bāndhavān sva-janaṁ hi kathaṁ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava
शब्दार्थ
tasmāt—hence; na—never; arhāḥ—behoove; vayam—we; hantum—to kill; dhārtarāṣhṭrān—the sons of Dhritarashtra; sva-bāndhavān—along with friends; sva-janam—kinsmen; hi—certainly; katham—how; hatvā—by killing; sukhinaḥ—happy; syāma—will we become; mādhava—Shree Krishna, the husband of Yogmaya
अनुवाद
हे माधव ! इसलिये अपने बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए योग्य नहीं है, क्योंकि स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे।
अर्थ एवं व्याख्या
यहाँ अर्जुन का मोह उनके विवेक को आच्छादित कर रहा है, जहाँ वे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को धर्म के सर्वोच्च कर्तव्य से अधिक महत्व दे रहे हैं। यह श्लोक मानवीय स्वभाव के उस द्वंद्व को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति स्वार्थपूर्ण सुख की प्राप्ति के लिए अधर्म के मार्ग को अपनाने से कतराता है क्योंकि वह परिणामों की पीड़ा से भयभीत है।