अध्याय 1, श्लोक 45 (भगवद् गीता 1.45)
संस्कृत श्लोक
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः
लिप्यंतरण
aho bata mahat pāpaṁ kartuṁ vyavasitā vayam yad rājya-sukha-lobhena hantuṁ sva-janam udyatāḥ
शब्दार्थ
aho—alas; bata—how; mahat—great; pāpam—sins; kartum—to perform; vyavasitāḥ—have decided; vayam—we; yat—because; rājya-sukha-lobhena—driven by the desire for kingly pleasure; hantum—to kill; sva-janam—kinsmen; udyatāḥ—intending;
अनुवाद
अहो ! शोक है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो कि इस राज्यसुख के लोभ से अपने कुटुम्ब का नाश करने के लिये तैयार हो गये हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक मोह और स्वार्थ के वशीभूत होकर किए जाने वाले कृत्यों के आत्मघाती परिणामों को दर्शाता है। यह मानवीय विवेक की उस जागृति को व्यक्त करता है जहाँ व्यक्ति अपने क्षणिक सुख के लिए अनैतिक मार्ग चुनने के गहरे नैतिक अपराधबोध का अनुभव करता है।