अध्याय 10, श्लोक 41 (भगवद् गीता 10.41)

अध्याय 10: विभूतियोग

संस्कृत श्लोक

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्

लिप्यंतरण

yad yad vibhūtimat sattvaṁ śhrīmad ūrjitam eva vā tat tad evāvagachchha tvaṁ mama tejo ’nśha-sambhavam

शब्दार्थ

yat yat—whatever; vibhūtimat—opulent; sattvam—being; śhrī-mat—beautiful; ūrjitam—glorious; eva—also; vā—or; tat tat—all that; eva—only; avagachchha—know; tvam—you; mama—my; tejaḥ-anśha-sambhavam—splendor; anśha—a part; sambhavam—born of

अनुवाद

जो कुछ भी विभूतिवान, श्रीयुक्त और बलवान है, उसे तुम मेरे तेज के एक अंश से ही उत्पन्न समझो।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह दिव्य सत्य समझा रहे हैं कि इस संसार में जो कुछ भी श्रेष्ठ, कान्तियुक्त या सामर्थ्यवान है, वह सब उन्हीं का ही वैभव है। साधक को यह बोध होना चाहिए कि जगत की प्रत्येक सुंदर और शक्तिशाली वस्तु में परमेश्वर का ही अंश विद्यमान है। जब भक्त हर कण में योगेश्वर कृष्ण की उपस्थिति को देखने का अभ्यास करता है, तब उसका अहं विलीन हो जाता है और उसे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त दिखाई देने लगता है। यह दृष्टि मनुष्य को संसार के आकर्षणों से ऊपर उठाकर उसे परमात्मा के साथ एकाकार होने की प्रेरणा देती है। कृष्ण की यह वाणी समस्त मानवता के लिए वह प्रकाश पुंज है, जो हमें भौतिकता से हटाकर आध्यात्मिक सत्य की ओर ले जाती है।

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