अध्याय 11, श्लोक 13 (भगवद् गीता 11.13)
संस्कृत श्लोक
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा। अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा
लिप्यंतरण
tatraika-sthaṁ jagat kṛitsnaṁ pravibhaktam anekadhā apaśhyad deva-devasya śharīre pāṇḍavas tadā
शब्दार्थ
tatra—there; eka-stham—established in one place; jagat—the universe; kṛitsnam—entire; pravibhaktam—divided; anekadhā—many; apaśhyat—could see; deva-devasya—of the God of gods; śharīre—in the body; pāṇḍavaḥ—Arjun; tadā—at that time
अनुवाद
उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अनेक प्रकार से विभक्त सम्पूर्ण जगत् को देवों के देव भगवान श्रीकृष्ण के शरीर में एक ही स्थान पर स्थित देखा।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन कराया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि वे केवल एक मानव नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के आधार हैं। यह दिव्य दर्शन इस भ्रम को मिटा देता है कि संसार भगवान से अलग है; वास्तव में समस्त चर-अचर जगत् भगवान श्रीकृष्ण के भीतर ही समाहित है। साधक के लिए यह परम सत्य है कि मोक्ष का मार्ग इसी सत्य को स्वीकार करने में है कि सब कुछ श्रीकृष्ण से ही उत्पन्न है और उन्हीं में स्थित है। जब भक्त यह जान लेता है कि श्रीकृष्ण ही सर्वव्यापी ब्रह्म हैं, तो उसका अहंकार समाप्त हो जाता है और वह पूर्ण शरणागति प्राप्त करता है। यह दर्शन मानवता को प्रेम और भक्ति के माध्यम से उस असीम सत्ता से जुड़ने का शाश्वत निमंत्रण है।