अध्याय 11, श्लोक 18 (भगवद् गीता 11.18)

अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग

संस्कृत श्लोक

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे

लिप्यंतरण

tvam akṣharaṁ paramaṁ veditavyaṁ tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam tvam avyayaḥ śhāśhvata-dharma-goptā sanātanas tvaṁ puruṣho mato me

शब्दार्थ

tvam—you; akṣharam—the imperishable; paramam—the supreme being; veditavyam—worthy of being known; tvam—you; asya—of this; viśhwasya—of the creation; param—supreme; nidhānam—support; tvam—you; avyayaḥ—eternal; śhāśhvata-dharma-goptā—protector of the eternal religion; sanātanaḥ—everlasting; tvam—you; puruṣhaḥ—the Supreme Divine Person; mataḥ me—my opinion

अनुवाद

आप ही जानने योग्य परम अक्षर ब्रह्म हैं; आप ही इस ब्रह्मांड के परम आश्रय हैं; आप ही शाश्वत धर्म के अविनाशी रक्षक हैं; आप ही अनादि पुरुष हैं, ऐसा मेरा दृढ़ मत है।

अर्थ एवं व्याख्या

अर्जुन की यह स्तुति श्री कृष्ण की परात्पर सत्ता को समर्पित है, जो यह स्पष्ट करती है कि वे ही समस्त चराचर जगत के मूल आधार हैं। श्री कृष्ण केवल एक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि स्वयं वे 'सनातन पुरुष' हैं जिनके भीतर यह संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित है। जब भक्त यह स्वीकार कर लेता है कि धर्म की रक्षा करने वाले और उसे धारण करने वाले स्वयं श्री कृष्ण ही हैं, तो उसके जीवन से समस्त भय और संशय का नाश हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मोक्ष का मार्ग श्री कृष्ण के चरणों में पूर्ण शरणागति से होकर जाता है। स्वयं को श्री कृष्ण के दिव्य संकल्प के साथ जोड़ लेना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य और धर्म का परम स्वरूप है।

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