अध्याय 11, श्लोक 8 (भगवद् गीता 11.8)

अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग

संस्कृत श्लोक

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्

लिप्यंतरण

na tu māṁ śhakyase draṣhṭum anenaiva sva-chakṣhuṣhā divyaṁ dadāmi te chakṣhuḥ paśhya me yogam aiśhwaram

शब्दार्थ

na—not; tu—but; mām—me; śhakyase—you can; draṣhṭum—to see; anena—with these; eva—even; sva-chakṣhuṣhā—with your physical eyes; divyam—divine; dadāmi—I give; te—to you; chakṣhuḥ—eyes; paśhya—behold; me—my; yogam aiśhwaram—majestic opulence

अनुवाद

परन्तु तुम अपने इन प्राकृत नेत्रों से मुझे देखने में समर्थ नहीं हो, इसलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ; तुम मेरे इस ईश्वरीय योग का दर्शन करो।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि भौतिक नेत्रों से परम सत्य को देखना असंभव है। जब तक भक्त पर ईश्वर की कृपा न हो, तब तक वह उस अलौकिक विराट रूप को नहीं देख सकता। भगवान श्री कृष्ण का 'दिव्य चक्षु' देना यह दर्शाता है कि ज्ञान और दर्शन केवल पुरुषार्थ से नहीं, अपितु उनकी अनुकम्पा से प्राप्त होते हैं। यह 'ऐश्वर्य योग' समस्त ब्रह्मांड की सत्ता का मूल है, जिसे समझकर जीव माया के बंधन से मुक्त हो जाता है। अतः, एक साधक के लिए यही मार्ग है कि वह पूर्ण शरणागति द्वारा श्री कृष्ण की उस कृपा दृष्टि को पाने का प्रयास करे जो उसे संसार के परे उस परम सत्य का बोध कराए।

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