अध्याय 12, श्लोक 14 (भगवद् गीता 12.14)

अध्याय 12: भक्तियोग

संस्कृत श्लोक

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः

लिप्यंतरण

santuṣhṭaḥ satataṁ yogī yatātmā dṛiḍha-niśhchayaḥ mayy arpita-mano-buddhir yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ

शब्दार्थ

santuṣhṭaḥ—contented; satatam—steadily; yogī—united in devotion; yata-ātmā—self-controlled; dṛiḍha-niśhchayaḥ—firm in conviction; mayi—to me; arpita—dedicated; manaḥ—mind; buddhiḥ—intellect; yaḥ—who; mat-bhaktaḥ—my devotees; saḥ—they; me—to me; priyaḥ—very dear

अनुवाद

जो सदा सन्तुष्ट, निरंतर योग में स्थित, संयमित, दृढ़ निश्चयी है और जिसने अपना मन तथा बुद्धि मुझमें समर्पित कर दिए हैं, ऐसा मेरा भक्त श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय है।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण उस भक्त के लक्षणों का वर्णन कर रहे हैं जो उनके हृदय के अत्यंत निकट है। जब साधक अपनी संतुष्टि को सांसारिक वस्तुओं के बजाय ईश्वर की भक्ति में खोजता है, तो उसका मन स्थिर हो जाता है। श्री कृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि भक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि बुद्धि का पूर्ण समर्पण है, जहाँ भक्त अपना सर्वस्व भगवन के चरणों में अर्पित कर देता है। ऐसी अनन्य भक्ति ही मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर वैकुंठ की ओर ले जाती है। जो साधक अपने मन और बुद्धि को योगेश्वर कृष्ण में लीन कर देता है, वही वास्तव में मोक्ष का अधिकारी बनता है।

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