अध्याय 12, श्लोक 16 (भगवद् गीता 12.16)

अध्याय 12: भक्तियोग

संस्कृत श्लोक

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः

लिप्यंतरण

anapekṣhaḥ śhuchir dakṣha udāsīno gata-vyathaḥ sarvārambha-parityāgī yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ

शब्दार्थ

anapekṣhaḥ—indifferent to worldly gain; śhuchiḥ—pure; dakṣhaḥ—skillful; udāsīnaḥ—without cares; gata-vyathaḥ—untroubled; sarva-ārambha—of all undertakings; parityāgī—renouncer; saḥ—who; mat-bhaktaḥ—my devotee; saḥ—he; me—to ne; priyaḥ—very dear

अनुवाद

जो अपेक्षारहित, शुद्ध, दक्ष, उदासीन, व्यथारहित और सर्वकर्मों के आरंभ का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे अति प्रिय है।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण उस भक्त के हृदय की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं जो पूर्णतः उनके शरणागत हो चुका है। ऐसे भक्त की शुद्धता और निस्पृहता उसे संसार के द्वंद्वों से ऊपर उठा देती है, जिससे वह सुख-दुःख की सीमाओं से मुक्त हो जाता है। जब भक्त अपने प्रत्येक कार्य के कर्तापन का भाव श्री कृष्ण को समर्पित कर देता है, तब उसके द्वारा किए गए कार्य भी दिव्य हो जाते हैं। भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो स्वयं को पूरी तरह से उनकी सेवा में अर्पित कर देता है, वह उनकी कृपा का पात्र और अत्यंत प्रिय बन जाता है। यह अवस्था साधक को मुक्ति के मार्ग पर ले जाती है, जहाँ केवल श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम ही शेष रहता है।

Read this verse in English