अध्याय 12, श्लोक 9 (भगवद् गीता 12.9)
संस्कृत श्लोक
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय
लिप्यंतरण
atha chittaṁ samādhātuṁ na śhaknoṣhi mayi sthiram abhyāsa-yogena tato mām ichchhāptuṁ dhanañjaya
शब्दार्थ
atha—if; chittam—mind; samādhātum—to fix; na śhaknoṣhi—(you) are unable; mayi—on me; sthiram—steadily; abhyāsa-yogena—by uniting with God through repeated practice; tataḥ—then; mām—me; ichchhā—desire; āptum—to attain; dhanañjaya—Arjun, the conqueror of wealth
अनुवाद
हे धनंजय! यदि तुम अपने मन को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं हो, तो अभ्यासयोग के द्वारा तुम मुझे प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण, जो स्वयं परमेश्वर हैं, अपने भक्त अर्जुन को साधना का एक सरल मार्ग प्रदान कर रहे हैं। जब मन चंचल होकर श्री कृष्ण के स्वरूप में एकाग्र नहीं हो पाता, तब वे 'अभ्यासयोग' का उपदेश देते हैं, जो निरंतर प्रयत्न की शक्ति को दर्शाता है। बार-बार मन को सांसारिक विषयों से हटाकर भगवान के चिंतन में लगाने से चेतना शुद्ध हो जाती है और भक्त धीरे-धीरे प्रभु की समीपता प्राप्त कर लेता है। श्री कृष्ण का यह आश्वासन यह सिद्ध करता है कि वे केवल पूर्णता के आकांक्षी नहीं, बल्कि भक्त के अनवरत प्रयास के भी उतने ही प्रेमी हैं। यह अभ्यास साधक को भवसागर से पार ले जाकर भगवद् प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।