अध्याय 14, श्लोक 13 (भगवद् गीता 14.13)

अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग

संस्कृत श्लोक

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन

लिप्यंतरण

aprakāśho ’pravṛittiśh cha pramādo moha eva cha tamasy etāni jāyante vivṛiddhe kuru-nandana

शब्दार्थ

aprakāśhaḥ—nescience; apravṛittiḥ—inertia; cha—and; pramādaḥ—negligence; mohaḥ—delusion; eva—indeed; cha—also; tamasi—mode of ignorance; etāni—these; jāyante—manifest; vivṛiddhe—when dominates; kuru-nandana—the joy of the Kurus, Arjun

अनुवाद

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: 'हे कुरुनन्दन! तमोगुण की वृद्धि होने पर अप्रकाश (अज्ञान), अप्रवृत्ति (आलस्य), प्रमाद (सावधानी का अभाव) और मोह उत्पन्न होते हैं।'

अर्थ एवं व्याख्या

परमेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि किस प्रकार तमोगुण आत्मा की दिव्य चेतना को ढक लेता है और मनुष्य को आध्यात्मिक पतन की ओर ले जाता है। जब कोई भक्त अज्ञान के इन अंधकारों में फंसता है, तो वह योगेश्वर कृष्ण की सेवा और उनके प्रति प्रेम से दूर हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का यह उपदेश एक चेतावनी है कि आलस्य और प्रमाद सांसारिक बंधन को और अधिक दृढ़ करते हैं, जिससे जीव जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। साधक को चाहिए कि वह श्रीकृष्ण की शरण लेकर अपने भीतर के अंधकार को मिटाए और प्रकाशमय मार्ग को अपनाए। एकमात्र श्रीकृष्ण की कृपा ही जीव को मोह के इस गहन जाल से मुक्त कर उन्हें मोक्ष के दिव्य धाम तक ले जाने में समर्थ है।

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