अध्याय 14, श्लोक 24 (भगवद् गीता 14.24)
संस्कृत श्लोक
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः
लिप्यंतरण
sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-sanstutiḥ
शब्दार्थ
sama—alike; duḥkha—distress; sukhaḥ—happiness; sva-sthaḥ—established in the self; sama—equally; loṣhṭa—a clod; aśhma—stone; kāñchanaḥ—gold; tulya—of equal value; priya—pleasant; apriyaḥ—unpleasant; dhīraḥ—steady; tulya—the same; nindā—blame; ātma-sanstutiḥ—praise;
अनुवाद
जो सुख-दु:ख को समान समझने वाला है, जो अपने स्वरूप में स्थित है, जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण समान हैं, जो प्रिय और अप्रिय को एक समान देखता है, जो धीर है और जिसे निन्दा तथा स्तुति समान हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता को उस उच्च आध्यात्मिक स्थिति का उपदेश दे रहे हैं, जहाँ साधक द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाती है, तब संसार की भौतिक वस्तुएँ—चाहे वे मिट्टी हों या सोना—समान हो जाती हैं। यह समभाव केवल उस भक्त में आता है जो भगवान श्री कृष्ण की शरण में पूर्णतः लीन हो चुका है। ऐसा पुरुष सांसारिक प्रशंसा और निंदा के प्रभाव से परे होकर, योगेश्वर कृष्ण के शाश्वत प्रेम में स्थित रहता है। यही वह मार्ग है जो साधक को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है।