अध्याय 14, श्लोक 4 (भगवद् गीता 14.4)

अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग

संस्कृत श्लोक

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता

लिप्यंतरण

sarva-yoniṣhu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ tāsāṁ brahma mahad yonir ahaṁ bīja-pradaḥ pitā

शब्दार्थ

sarva—all; yoniṣhu—species of life; kaunteya—Arjun, the son of Kunti; mūrtayaḥ—forms; sambhavanti—are produced; yāḥ—which; tāsām—of all of them; brahma-mahat—great material nature; yoniḥ—womb; aham—I; bīja-pradaḥ—seed-giving; pitā—Father

अनुवाद

हे कौन्तेय! समस्त योनियों में जो-जो भी मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि अर्थात् गर्भ-धारण करने वाली तो प्रकृति है और मैं बीज स्थापित करने वाला पिता हूँ।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने सृष्टि के मूल रहस्य को उद्घाटित किया है, जहाँ वे स्वयं को समस्त जीवों का परम पिता घोषित करते हैं। प्रकृति (महद्ब्रह्म) केवल माध्यम है, लेकिन समस्त चेतना का बीजारोपण स्वयं योगेश्वर कृष्ण ही करते हैं। यह ज्ञान साधक को उस भौतिक भ्रम से मुक्त करता है जो उसे केवल एक शरीर मानता है, और उसे उसकी वास्तविक आत्मा के रूप में कृष्ण से जोड़ता है। जब जीव यह समझ लेता है कि उसका उद्गम स्वयं भगवान श्री कृष्ण हैं, तो उसके भीतर भक्ति का अंकुर फूटता है और वह मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। यह दिव्य सत्य हमें सिखाता है कि हम सभी ईश्वर की संतान हैं और हमारा अंतिम गंतव्य उनकी शरण में वापस जाना ही है।

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