अध्याय 14, श्लोक 6 (भगवद् गीता 14.6)
संस्कृत श्लोक
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ
लिप्यंतरण
tatra sattvaṁ nirmalatvāt prakāśhakam anāmayam sukha-saṅgena badhnāti jñāna-saṅgena chānagha
शब्दार्थ
tatra—amongst these; sattvam—mode of goodness; nirmalatvāt—being purest; prakāśhakam—illuminating; anāmayam—healthy and full of well-being; sukha—happiness; saṅgena—attachment; badhnāti—binds; jñāna—knowledge; saṅgena—attachment; cha—also; anagha—Arjun, the sinless one
अनुवाद
हे निष्पाप अर्जुन! इन तीनों गुणों में, सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाशक और निर्दोष है; वह जीव को सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से बांध लेता है।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह गूढ़ रहस्य समझा रहे हैं कि भौतिक जगत के बंधन केवल तम और रज से ही नहीं, बल्कि सत्त्वगुण से भी होते हैं। यद्यपि सत्त्वगुण ज्ञान और सुख का अनुभव कराता है, परंतु यह 'मैं ज्ञानी हूँ' या 'मैं सुखी हूँ' का सूक्ष्म अहंकार उत्पन्न कर जीव को संसार में उलझाए रखता है। योगेश्वर कृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि मुक्ति का मार्ग इन गुणों से ऊपर उठने में है, जो केवल पूर्ण शरणागति और उनकी भक्ति से ही संभव है। जब भक्त यह समझ जाता है कि सुख और ज्ञान का अंतिम स्रोत स्वयं भगवान श्री कृष्ण हैं, तब वह इन गुणों के प्रभाव से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। अतः साधक को चाहिए कि वह सत्त्वगुण के प्रकाश में स्थित रहकर भी उसके प्रति आसक्ति न रखे और अपना मन निरंतर पुरुषोत्तम प्रभु के चरणों में समर्पित करे।