अध्याय 3, श्लोक 26 (भगवद् गीता 3.26)

अध्याय 3: कर्मयोग

संस्कृत श्लोक

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्

लिप्यंतरण

na buddhi-bhedaṁ janayed ajñānāṁ karma-saṅginām joṣhayet sarva-karmāṇi vidvān yuktaḥ samācharan

शब्दार्थ

na—not; buddhi-bhedam—discord in the intellects; janayet—should create; ajñānām—of the ignorant; karma-saṅginām—who are attached to fruitive actions; joṣhayet—should inspire (them) to perform; sarva—all; karmāṇi—prescribed; vidvān—the wise; yuktaḥ—enlightened; samācharan—performing properly

अनुवाद

ज्ञानी पुरुष को कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न नहीं करना चाहिए; उसे स्वयं योगयुक्त होकर समस्त कर्मों का भली-भांति आचरण करना चाहिए और उन्हें भी कर्म करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक एक आत्मज्ञानी के सामाजिक उत्तरदायित्व और धैर्य को दर्शाता है। यह सिखाता है कि आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति को दूसरों की मानसिक स्थिति का सम्मान करना चाहिए और उन्हें जबरदस्ती अपनी विचारधारा बदलने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। स्वयं आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करना उपदेश देने से कहीं अधिक प्रभावी होता है, क्योंकि कर्मठता से ही दूसरों में सुधार की प्रेरणा जागृत होती है। यह जीवन का एक व्यावहारिक दर्शन है जो सिखाता है कि निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य समाज में एक सकारात्मक बदलाव की लहर पैदा करता है। इस प्रकार, ज्ञानी पुरुष समाज की निरंतरता बनाए रखते हुए लोगों को धीरे-धीरे निष्काम कर्म की ओर ले जाता है।

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