अध्याय 3, श्लोक 6 (भगवद् गीता 3.6)

अध्याय 3: कर्मयोग

संस्कृत श्लोक

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते

लिप्यंतरण

karmendriyāṇi sanyamya ya āste manasā smaran indriyārthān vimūḍhātmā mithyāchāraḥ sa uchyate

शब्दार्थ

karma-indriyāṇi—the organs of action; sanyamya—restrain; yaḥ—who; āste—remain; manasā—in the mind; smaran—to remember; indriya-arthān—sense objects; vimūḍha-ātmā—the deluded; mithyā-āchāraḥ—hypocrite; saḥ—they; uchyate—are called

अनुवाद

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य कर्मेन्द्रियों को तो वश में कर लेता है, परन्तु मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहलाता है।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक जीवन केवल बाहरी त्याग का नाम नहीं है, बल्कि मन की शुद्धि ही वास्तविक संयम है। जब कोई व्यक्ति शरीर से तो कर्मों को रोक लेता है लेकिन मन में भोगों की इच्छा पाले रखता है, तो वह स्वयं के प्रति ही छल कर रहा होता है। यह मानसिक द्वंद्व ही मनुष्य को अधोगति की ओर ले जाता है। सच्चा संयम तब आता है जब हमारी इंद्रियाँ और मन एक दिशा में स्थिर हों। अंततः, यह श्लोक बाहरी दिखावे के बजाय आंतरिक ईमानदारी को अपनाने की प्रेरणा देता है।

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