अध्याय 8, श्लोक 19 (भगवद् गीता 8.19)

अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग

संस्कृत श्लोक

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे

लिप्यंतरण

bhūta-grāmaḥ sa evāyaṁ bhūtvā bhūtvā pralīyate rātryāgame ’vaśhaḥ pārtha prabhavatyahar-āgame

शब्दार्थ

bhūta-grāmaḥ—the multitude of beings; saḥ—these; eva—certainly; ayam—this; bhūtvā bhūtvā—repeatedly taking birth; pralīyate—dissolves; rātri-āgame—with the advent of night; avaśhaḥ—helpless; pārtha—Arjun, the son of Pritha; prabhavati—become manifest; ahaḥ-āgame—with the advent of day

अनुवाद

हे अर्जुन, वही यह भूत-समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर, विवश होकर, रात्रि के आगमन पर लीन हो जाता है और दिन के आगमन पर फिर से प्रकट हो जाता है।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण सृष्टि के उस शाश्वत चक्र को स्पष्ट कर रहे हैं जो उनके ही संकल्प से संचालित होता है। श्री कृष्ण बताते हैं कि जीवात्माएं अपने कर्मों के वशीभूत होकर विवशतापूर्वक जन्म-मरण के इस निरंतर चक्र में फंसी रहती हैं, जो कि प्रभु की दिन और रात्रि यानी सृष्टि और प्रलय का ही एक रूप है। भगवान श्री कृष्ण हमें यह ज्ञान दे रहे हैं कि जब तक जीव इस मायावी चक्र में लिप्त रहता है, उसे शांति प्राप्त नहीं होती। इस चक्र से मुक्ति का एकमात्र मार्ग श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण शरणागति और उनकी भक्ति है। जो भक्त भगवान श्री कृष्ण के दिव्य स्वरूप को जान लेता है, वह इस अनादि चक्र से ऊपर उठकर परम पद को प्राप्त करता है।

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