अध्याय 8, श्लोक 24 (भगवद् गीता 8.24)

अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग

संस्कृत श्लोक

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः

लिप्यंतरण

agnir jyotir ahaḥ śhuklaḥ ṣhaṇ-māsā uttarāyaṇam tatra prayātā gachchhanti brahma brahma-vido janāḥ

शब्दार्थ

agniḥ—fire; jyotiḥ—light; ahaḥ—day; śhuklaḥ—the bright fortnight of the moon; ṣhaṭ-māsāḥ—six months; uttara-ayanam—the sun’s northern course; tatra—there; prayātāḥ—departed; gachchhanti—go; brahma—Brahman; brahma-vidaḥ—those who know the Brahman; janāḥ—persons;

अनुवाद

अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छः महीनों में, जो ब्रह्म को जानने वाले पुरुष शरीर त्यागकर जाते हैं, वे ब्रह्म को ही प्राप्त होते हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण उन आत्मज्ञानी महापुरुषों की दिव्य गति का वर्णन कर रहे हैं जो ब्रह्म में स्थित होकर शरीर का त्याग करते हैं। योगेश्वर कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि प्रकाश और ज्ञान के मार्ग पर चलने वाले भक्त के लिए मृत्यु का क्षण एक दिव्य मिलन का द्वार बन जाता है। यहाँ अग्नि, दिन और उत्तरायण जैसे प्रतीक उस परम चेतना के सूचक हैं, जहाँ अज्ञान का अंधकार पूरी तरह मिट जाता है। भगवान श्री कृष्ण का यह आश्वासन साधक के हृदय में अभय प्रदान करता है कि जो निरंतर मेरा चिंतन करते हैं, उन्हें ब्रह्म की प्राप्ति अवश्य होती है। यह उपदेश हमें सिखाता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक बंधनों से मुक्ति नहीं, अपितु भगवान श्री कृष्ण के नित्य धाम में विलीन होना है।

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