अध्याय 8, श्लोक 27 (भगवद् गीता 8.27)

अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग

संस्कृत श्लोक

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन

लिप्यंतरण

naite sṛitī pārtha jānan yogī muhyati kaśhchana tasmāt sarveṣhu kāleṣhu yoga-yukto bhavārjuna

शब्दार्थ

na—never; ete—these two; sṛitī—paths; pārtha—Arjun, the son of Pritha; jānan—knowing; yogī—a yogi; muhyati—bewildered; kaśhchana—any; tasmāt—therefore; sarveṣhu kāleṣhu—always; yoga-yuktaḥ—situated in Yog; bhava—be; arjuna—Arjun

अनुवाद

हे अर्जुन, इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए, हे अर्जुन, तुम सर्वदा योगयुक्त बनो।

अर्थ एवं व्याख्या

भगवान श्री कृष्ण, जो स्वयं परमेश्वर हैं, अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता को यह दिव्य संदेश दे रहे हैं कि सत्य का ज्ञान ही अज्ञानता के अंधकार को मिटा सकता है। जब एक साधक यह समझ लेता है कि किन मार्गों से जीवात्मा परमात्मा तक पहुँचती है, तब वह सांसारिक मोह-माया के भ्रम में नहीं फँसता। श्री कृष्ण का यह आदेश कि 'सब काल में योगयुक्त बनो', निरंतर उनके स्मरण और शरणागति में रहने का आह्वान है। यह योग ही जीव को संसार के चक्र से मुक्त कर श्री कृष्ण के परम धाम की ओर ले जाता है। अतः, भगवान श्री कृष्ण के प्रति समर्पित होकर जीवन जीना ही मोक्ष का एकमात्र सुनिश्चित मार्ग है।

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