अध्याय 8, श्लोक 4 (भगवद् गीता 8.4)

अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग

संस्कृत श्लोक

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर

लिप्यंतरण

adhibhūtaṁ kṣharo bhāvaḥ puruṣhaśh chādhidaivatam adhiyajño ’ham evātra dehe deha-bhṛitāṁ vara

शब्दार्थ

adhibhūtam—the ever changing physical manifestation; kṣharaḥ—perishable; bhāvaḥ—nature; puruṣhaḥ—the cosmic personality of God, encompassing the material creation; cha—and; adhidaivatam—the Lord of the celestial gods; adhiyajñaḥ—the Lord of all sacrifices; aham—I; eva—certainly; atra—here; dehe—in the body; deha-bhṛitām—of the embodied; vara—O best

अनुवाद

हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! नश्वर पदार्थों का ज्ञान अधिभूत है, दिव्य पुरुष अधिदैव है, और इस शरीर में मैं स्वयं ही अधियज्ञ हूँ।

अर्थ एवं व्याख्या

भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को सृष्टि के सूक्ष्म सत्य का दर्शन करा रहे हैं, जहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि संपूर्ण जगत उन्हीं के स्वरूप का विस्तार है। अधियज्ञ के रूप में वे स्वयं को प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित यज्ञ के भोक्ता के रूप में स्थापित करते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि जीवन का प्रत्येक कर्म यदि श्री कृष्ण को समर्पित हो, तो वह मोक्ष का मार्ग बन जाता है। नश्वर भौतिक तत्वों और अधिदैव के परे, श्री कृष्ण ही वह शाश्वत तत्व हैं जो समस्त प्राणियों के भीतर विराजमान हैं। साधक के लिए इसका संदेश यह है कि वह अपने देहाभिमान को त्यागकर अपने भीतर स्थित योगेश्वर श्री कृष्ण को पहचाने। यह बोध ही मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर परम आनंद की प्राप्ति कराता है।

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