अध्याय 9, श्लोक 12 (भगवद् गीता 9.12)
अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग
संस्कृत श्लोक
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः
लिप्यंतरण
moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ rākṣhasīm āsurīṁ chaiva prakṛitiṁ mohinīṁ śhritāḥ
शब्दार्थ
mogha-āśhāḥ—of vain hopes; mogha-karmāṇaḥ—of vain actions; mogha-jñānāḥ—of baffled knowledge; vichetasaḥ—deluded; rākṣhasīm—demoniac; āsurīm—atheistic; cha—and; eva—certainly; prakṛitim—material energy; mohinīm—bewildered; śhritāḥ—take shelter
अनुवाद
वे राक्षसी और आसुरी प्रवृत्तियों वाले लोग व्यर्थ की आशा, व्यर्थ के कर्म और व्यर्थ के ज्ञान में उलझे रहते हैं; उनका विवेक नष्ट हो चुका होता है और वे मोहित रहते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से उन आत्माओं की दयनीय स्थिति का वर्णन कर रहे हैं जो ईश्वर से विमुख होकर केवल भौतिकता में लिप्त रहती हैं। जब मनुष्य का स्वभाव आसुरी हो जाता है, तो उसके सारे प्रयास—चाहे वह सांसारिक सफलता की आशा हो या अहंकारपूर्ण कर्म—सब व्यर्थ हो जाते हैं। भगवान श्री कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि बिना परमात्मा के शरणागत हुए, व्यक्ति का ज्ञान भी केवल माया का जाल ही है। यह चेतावनी प्रत्येक साधक के लिए है कि अपने भीतर के आसुरी भावों को त्याग कर पूर्ण समर्पण के साथ श्री कृष्ण की शरण में आएं, क्योंकि इसी से मोक्ष और शाश्वत शांति प्राप्त हो सकती है।