अध्याय 9, श्लोक 18 (भगवद् गीता 9.18)

अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग

संस्कृत श्लोक

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्

लिप्यंतरण

gatir bhartā prabhuḥ sākṣhī nivāsaḥ śharaṇaṁ suhṛit prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam

शब्दार्थ

gatiḥ—the supreme goal; bhartā—sustainer; prabhuḥ—master; sākṣhī—witness; nivāsaḥ—abode; śharaṇam—shelter; su-hṛit—friend; prabhavaḥ—the origin; pralayaḥ—dissolution; sthānam—store house; nidhānam—resting place; bījam—seed; avyayam—imperishable

अनुवाद

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण स्वयं को समस्त चराचर जगत का परम आधार और अंतर्यामी स्वरूप घोषित कर रहे हैं। वे अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि वे केवल एक पथप्रदर्शक नहीं, अपितु आत्मा का अंतिम लक्ष्य और एकमात्र शरणस्थल हैं। भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीव को भव-सागर से मुक्ति दिलाने का एकमात्र उपाय है। जब साधक यह अनुभव करता है कि समस्त सृष्टि उन्हीं 'अव्यय बीज' से उत्पन्न हुई है और उन्हीं में विलीन होती है, तो उसके भीतर का द्वैत भाव समाप्त हो जाता है। यह दिव्य ज्ञान भक्त को संसार की नश्वरता से हटाकर शाश्वत परमात्मा के प्रेम में लीन कर देता है।

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