अध्याय 9, श्लोक 28 (भगवद् गीता 9.28)

अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग

संस्कृत श्लोक

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि

लिप्यंतरण

śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣhyasi

शब्दार्थ

śhubha aśhubha phalaiḥ—from good and bad results; evam—thus; mokṣhyase—you shall be freed; karma—work; bandhanaiḥ—from the bondage; sanyāsa-yoga—renunciation of selfishness; yukta-ātmā—having the mind attached to me; vimuktaḥ—liberated; mām—to me; upaiṣhyasi—you shall reach

अनुवाद

इस प्रकार तुम शुभाशुभ फलों वाले कर्म-बंधनों से मुक्त हो जाओगे; संन्यास-योग से युक्तचित्त होकर तुम मुक्त हो जाओगे और मुझे ही प्राप्त करोगे।

अर्थ एवं व्याख्या

भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से जीव को कर्म के चक्र से मुक्ति का मार्ग दिखा रहे हैं। जब साधक अपने समस्त कर्मों के फलों को भगवान श्री कृष्ण को समर्पित कर देता है, तो वह पाप और पुण्य के बंधनों से ऊपर उठ जाता है। संन्यास-योग का अर्थ है फल की इच्छा का त्याग कर निरंतर कृष्ण-स्मरण में लीन रहना। जब मन पूरी तरह से श्री कृष्ण के चरणों में स्थिर हो जाता है, तो जीव सभी बंधनों को काटकर परम पद को प्राप्त करता है। यह अंततः भगवत प्राप्ति का वह मार्ग है जहाँ भक्त स्वयं कृष्ण का सानिध्य प्राप्त करता है।

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