अध्याय 9, श्लोक 5 (भगवद् गीता 9.5)
अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग
संस्कृत श्लोक
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः
लिप्यंतरण
na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ
शब्दार्थ
na—never; cha—and; mat-sthāni—abide in me; bhūtāni—all living beings; paśhya—behold; me—my; yogam aiśhwaram—divine energy; bhūta-bhṛit—the sustainer of all living beings; na—never; cha—yet; bhūta-sthaḥ—dwelling in; mama—my; ātmā—self; bhūta-bhāvanaḥ—the creator of all beings
अनुवाद
और वे प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं; मेरे ईश्वरीय योग को देखो! समस्त प्राणियों को उत्पन्न करने वाला और धारण करने वाला मेरा स्वरूप वास्तव में उन प्राणियों में स्थित नहीं है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण अपनी अचिंत्य शक्ति का रहस्योद्घाटन कर रहे हैं, जिसे समझना सामान्य बुद्धि के परे है। भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि संपूर्ण जगत उनके आधार पर टिका है, फिर भी वे स्वयं इस जगत के गुण-दोषों से सर्वथा निर्लिप्त और परे हैं। यह उनकी 'दैवी योगमाया' का प्रभाव है कि वे सर्वव्यापी होकर भी किसी बंधन में नहीं बंधते। एक साधक के लिए यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वह संसार के पदार्थों में अपनी स्थिति न ढूँढे, अपितु उस परमात्मा में अपनी चेतना को स्थित करे जो सबका आधार है। जब भक्त इस रहस्य को समझ लेता है कि श्रीकृष्ण ही सृष्टि के मूल और अधिष्ठान हैं, तब वह समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।