अध्याय 1, श्लोक 6 (भगवद् गीता 1.6)

अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग

संस्कृत श्लोक

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः

लिप्यंतरण

saubhadro draupadeyāśhcha sarva eva mahā-rathāḥ

शब्दार्थ

saubhadraḥ—the son of Subhadra; draupadeyāḥ—the sons of Draupadi; cha—and; sarve—all; eva—indeed; mahā-rathāḥ—warriors who could single handedly match the strength of ten thousand ordinary warriors

अनुवाद

पराक्रमी युधामन्यु, बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) और द्रोपदी के पुत्र -- ये सब महारथी हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक उस मानवीय मानसिकता को दर्शाता है जहाँ संघर्ष के समय व्यक्ति अपने बल और सहयोगियों की गणना करके सुरक्षा की भावना ढूंढता है। यह दर्शाता है कि कैसे अहंकार बाह्य सामर्थ्य पर गर्व करके अपनी विजय की संभावनाओं को पुष्ट करने का मानसिक प्रयास करता है।

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