अध्याय 10, श्लोक 25 (भगवद् गीता 10.25)

अध्याय 10: विभूतियोग

संस्कृत श्लोक

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः

लिप्यंतरण

maharṣhīṇāṁ bhṛigur ahaṁ girām asmyekam akṣharam yajñānāṁ japa-yajño ’smi sthāvarāṇāṁ himālayaḥ

शब्दार्थ

mahā-ṛiṣhīṇām—among the great seers; bhṛiguḥ—Bhrigu; aham—I; girām—amongst chants; asmi—I am; ekam akṣharam—the syllable Om; yajñānām—of sacrifices; japa-yajñaḥ—sacrifice of the devotional repetition of the divine names of God; asmi—I am; sthāvarāṇām—amongst immovable things; himālayaḥ—the Himalayas

अनुवाद

महर्षियों में मैं भृगु हूँ, शब्दों में मैं एकाक्षर ओंकार हूँ। यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ और स्थावर (अचल) वस्तुओं में मैं हिमालय हूँ।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह बोध करा रहे हैं कि वे ही समस्त जगत के मूल और श्रेष्ठता के आधार हैं। महर्षि भृगु, ओंकार और हिमालय के माध्यम से, श्री कृष्ण यह समझाते हैं कि चराचर जगत का प्रत्येक कण उनकी ही विभूति है। जपयज्ञ को सर्वश्रेष्ठ यज्ञ बताकर, श्री कृष्ण मन की एकाग्रता और निरंतर प्रभु-स्मरण के महत्व को प्रतिपादित करते हैं। यह ज्ञान साधक को संसार के भीतर ही परमात्मा को खोजने और अनुभव करने की प्रेरणा देता है। जब साधक यह समझ लेता है कि सब कुछ श्री कृष्ण का ही विस्तार है, तो उसके लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

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