अध्याय 10, श्लोक 30 (भगवद् गीता 10.30)
संस्कृत श्लोक
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्
लिप्यंतरण
prahlādaśh chāsmi daityānāṁ kālaḥ kalayatām aham mṛigāṇāṁ cha mṛigendro ’haṁ vainateyaśh cha pakṣhiṇām
शब्दार्थ
prahlādaḥ—Prahlad; cha—and; asmi—I am; daityānām—of the demons; kālaḥ—time; kalayatām—of all that controls; aham—I; mṛigāṇām—amongst animals; cha—and; mṛiga-indraḥ—the lion; aham—I; vainateyaḥ—Garud; cha—and; pakṣhiṇām—amongst birds
अनुवाद
मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल हूँ, मैं पशुओं में सिंह हूँ और पक्षियों में गरुड़ हूँ।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह बोध करा रहे हैं कि यह संपूर्ण जगत उनकी ही विभूतियों का विस्तार है। दैत्यों में प्रह्लाद के रूप में स्वयं को बताकर, श्री कृष्ण यह सिद्ध करते हैं कि भक्त का हृदय कहीं भी हो, वहाँ परमात्मा का वास होता है। वे स्वयं को 'काल' कहकर यह चेतावनी देते हैं कि समय का हर क्षण उनकी सत्ता के अधीन है और उसी के माध्यम से वे सृष्टि का संचालन करते हैं। पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ के रूप में अपनी उपस्थिति बताकर, वे अपनी असीम शक्ति और दिव्यता का संकेत देते हैं। जो साधक इस सत्य को हृदयंगम कर लेता है, वह समस्त द्वंद्वों से मुक्त होकर योगेश्वर श्री कृष्ण के परम पद को प्राप्त करता है।