अध्याय 10, श्लोक 31 (भगवद् गीता 10.31)

अध्याय 10: विभूतियोग

संस्कृत श्लोक

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी

लिप्यंतरण

pavanaḥ pavatām asmi rāmaḥ śhastra-bhṛitām aham jhaṣhāṇāṁ makaraśh chāsmi srotasām asmi jāhnavī

शब्दार्थ

pavanaḥ—the wind; pavatām—of all that purifies; asmi—I am; rāmaḥ—Ram; śhastra-bhṛitām—of the carriers of weapons; aham—I am; jhaṣhāṇām—of all acquatics; makaraḥ—crocodile; cha—also; asmi—I am; srotasām—of flowing rivers; asmi—I am; jāhnavī—the Ganges

अनुवाद

पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ, जलचरों में मैं मगरमच्छ हूँ और नदियों में मैं गंगा हूँ।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को अपनी व्यापकता का बोध करा रहे हैं। वे समझाते हैं कि संसार की प्रत्येक पवित्र और शक्तिशाली वस्तु में केवल उन्हीं का दिव्य अंश विद्यमान है। जब श्री कृष्ण स्वयं को वायु और गंगा के रूप में वर्णित करते हैं, तो वे भक्त को यह संकेत देते हैं कि प्रकृति के माध्यम से भी परमात्मा का स्मरण किया जा सकता है। यह ज्ञान साधक को सांसारिक मोह से मुक्त कर उसे यह देखने की दृष्टि प्रदान करता है कि श्री कृष्ण ही सब कुछ हैं। जो भक्त इस रहस्य को समझ लेता है, उसके लिए संसार का कण-कण भगवान श्री कृष्ण की सेवा और भक्ति का माध्यम बन जाता है।

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