अध्याय 10, श्लोक 36 (भगवद् गीता 10.36)
संस्कृत श्लोक
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्
लिप्यंतरण
dyūtaṁ chhalayatām asmi tejas tejasvinām aham jayo ’smi vyavasāyo ’smi sattvaṁ sattvavatām aham
शब्दार्थ
dyūtam—gambling; chhalayatām—of all cheats; asmi—I am; tejaḥ—the splendor; tejasvinām—of the splendid; aham—I; jayaḥ—victory; asmi—I am; vyavasāyaḥ—firm resolve; asmi—I am; sattvam—virtue; sattva-vatām—of the virtuous; aham—I
अनुवाद
मैं छल करने वालों का द्यूत (जुआ) हूँ, मैं तेजस्वियों का तेज हूँ, मैं विजय हूँ, मैं निश्चय करने वालों का निश्चय हूँ और मैं सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह रहस्य समझा रहे हैं कि वे इस चराचर जगत के कण-कण में विद्यमान हैं। चाहे वह छल का द्यूत हो या सत्पुरुषों का निश्छल भाव, दोनों ही स्थितियों में श्री कृष्ण की ही शक्ति कार्य कर रही है। एक साधक के लिए इसका अर्थ यह है कि उसे जीवन की हर घटना और हर गुण में श्री कृष्ण का ही दर्शन करना चाहिए। जब भक्त यह समझ लेता है कि सारा वैभव और समस्त सामर्थ्य उन्हीं का विस्तार है, तो उसके भीतर का अहंकार मिट जाता है। यह बोध ही जीव को माया के बंधनों से मुक्त कर सीधे भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों की ओर ले जाता है।