अध्याय 10, श्लोक 4 (भगवद् गीता 10.4)
संस्कृत श्लोक
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च
लिप्यंतरण
buddhir jñānam asammohaḥ kṣhamā satyaṁ damaḥ śhamaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ bhavo ’bhāvo bhayaṁ chābhayameva cha
शब्दार्थ
buddhiḥ—intellect; jñānam—knowledge; asammohaḥ—clarity of thought; kṣhamā—forgiveness; satyam—truthfulness; damaḥ—control over the senses; śhamaḥ—control of the mind; sukham—joy; duḥkham—sorrow; bhavaḥ—birth; abhāvaḥ—death; bhayam—fear; cha—and; abhayam—courage; eva—certainly; cha—and;
अनुवाद
बुद्धि, ज्ञान, मोह का अभाव, क्षमा, सत्य, इन्द्रिय-संयम, मन का निग्रह, सुख-दुःख, उत्पत्ति और प्रलय, भय और अभय—ये सभी प्राणियों के विविध भाव मेरे द्वारा ही रचे गए हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सभी गुण और विपरीत स्थितियाँ पूर्णतः उनकी ही शक्ति से उत्पन्न होती हैं। वे यह स्पष्ट करते हैं कि चाहे जीवन का आनंद हो या दुःख, भय हो या निर्भयता, ये सब उस परम सत्य श्रीकृष्ण के ही स्वरूप हैं। जब साधक यह समझ लेता है कि ये सभी स्थितियाँ उन्हीं की लीला का हिस्सा हैं, तो वह द्वैत के जाल से मुक्त होने लगता है। भगवद गीता का यह ज्ञान आत्मा को सांसारिक विकारों से ऊपर उठकर परमात्मा की शरण में जाने का मार्ग दिखाता है। अंततः, भक्त इन सभी भावों के साक्षी बनकर पूर्णतः श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित हो जाता है।