अध्याय 10, श्लोक 5 (भगवद् गीता 10.5)
संस्कृत श्लोक
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः
लिप्यंतरण
ahiṁsā samatā tuṣṭis tapo dānaṁ yaśo 'yaśaḥ bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛthag-vidhāḥ
शब्दार्थ
ahiṁsā—nonviolence; samatā—equilibrium; tuṣṭiḥ—satisfaction; tapaḥ—penance; dānam—charity; yaśaḥ—fame; ayaśaḥ—infamy; bhavanti—become; bhāvāḥ—natures; bhūtānām—of living entities; mattaḥ—from Me; eva—certainly; pṛthakvidhāḥ—differently arranged.
अनुवाद
अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश; प्राणियों के ये नाना प्रकार के भाव मेरे द्वारा ही उत्पन्न होते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जीवों के समस्त गुण और अवस्थाएं उन्हीं के संकल्प से प्रकट होती हैं। वे अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि संसार के समस्त द्वैत, जैसे यश-अपयश और सुख-दुख, उन्हीं की माया का विस्तार हैं। जब साधक यह समझ लेता है कि ये सभी वृत्तियाँ श्री कृष्ण से ही उद्भूत हैं, तो वह स्वतः ही संसार के आकर्षण और विकर्षण से मुक्त हो जाता है। यह बोध जीव को अहंकार से हटाकर भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण शरणागति की ओर ले जाता है। यही आत्मिक उन्नति का मार्ग है, जहाँ भक्त द्वंद्वों से ऊपर उठकर नित्य भगवान के सानिध्य का अनुभव करता है।