अध्याय 10, श्लोक 6 (भगवद् गीता 10.6)
संस्कृत श्लोक
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः
लिप्यंतरण
maharṣhayaḥ sapta pūrve chatvāro manavas tathā mad-bhāvā mānasā jātā yeṣhāṁ loka imāḥ prajāḥ
शब्दार्थ
mahā-ṛiṣhayaḥ—the great Sages; sapta—seven; pūrve—before; chatvāraḥ—four; manavaḥ—Manus; tathā—also; mat bhāvāḥ—are born from me; mānasāḥ—mind; jātāḥ—born; yeṣhām—from them; loke—in the world; imāḥ—all these; prajāḥ—people
अनुवाद
सात महर्षि, उनसे भी पहले के चार सनकादि ऋषि और चौदह मनु—ये सभी मेरे संकल्प (मन) से उत्पन्न हुए हैं और ये सभी शक्तियाँ मुझसे ही धारण करते हैं; इस संसार में जितनी भी प्रजा है, वह इन्हीं की संतान है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह बोध करा रहे हैं कि वे ही समस्त ब्रह्मांड के आदि स्रोत हैं। भगवान श्री कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मा, सनकादि और मनु जैसे महान स्रष्टा भी केवल उनके संकल्प मात्र से प्रकट हुए हैं। यह ज्ञान साधक को यह समझने में सहायता करता है कि सृष्टि का हर कण भगवान श्री कृष्ण की इच्छा का विस्तार है। जब भक्त यह जान लेता है कि श्री कृष्ण ही सब कुछ के मूल आधार हैं, तो उसका अहंकार समाप्त हो जाता है। यही आत्म-समर्पण भक्त को सांसारिक मोह से मुक्त कर भगवान श्री कृष्ण के नित्य चरणकमलों में स्थान दिलाता है।