अध्याय 10, श्लोक 7 (भगवद् गीता 10.7)

अध्याय 10: विभूतियोग

संस्कृत श्लोक

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः

लिप्यंतरण

etāṁ vibhūtiṁ yogaṁ cha mama yo vetti tattvataḥ so ’vikampena yogena yujyate nātra sanśhayaḥ

शब्दार्थ

etām—these; vibhūtim—glories; yogam—divine powers; cha—and; mama—my; yaḥ—those who; vetti—know; tattvataḥ—in truth; saḥ—they; avikalpena—unwavering; yogena—in bhakti yog; yujyate—becomes united; na—never; atra—here; sanśhayaḥ—doubt

अनुवाद

जो पुरुष मेरी इस ऐश्वर्यमयी विभूति और योग-शक्ति को तत्त्व से जानता है, वह निश्चल योग से युक्त हो जाता है; इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि उनकी विभूतियों का रहस्योद्घाटन केवल जानकारी नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है। जब भक्त यह जान लेता है कि यह समस्त चराचर जगत भगवान श्रीकृष्ण की ही योग-माया का विस्तार है, तो उसका मन सांसारिक द्वंद्वों से मुक्त होकर स्थिर हो जाता है। यह 'अविकम्प योग' वह अवस्था है जहाँ जीवात्मा का परमात्मा से अटूट संबंध स्थापित हो जाता है। श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण शरणागति और उनकी सर्वव्यापकता का यह बोध साधक को समस्त संदेहों से मुक्त कर देता है। इस दिव्य दृष्टि के उदय होने पर भक्त सदैव भगवान की उपस्थिति का अनुभव करता है, जिससे वह मोक्ष के परम धाम का अधिकारी बन जाता है।

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