अध्याय 11, श्लोक 10 (भगवद् गीता 11.10)
संस्कृत श्लोक
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्। अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्
लिप्यंतरण
aneka-vaktra-nayanam anekādbhuta-darśhanam aneka-divyābharaṇaṁ divyānekodyatāyudham
शब्दार्थ
aneka—many; vaktra—faces; nayanam—eyes; aneka—many; adbhuta—wonderful; darśhanam—had a vision of; aneka—many; divya—divine; ābharaṇam—ornaments; divya—divine; aneka—many; udyata—uplifted; āyudham—weapons;
अनुवाद
अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से सुसज्जित और अनेक दिव्य शस्त्रों को हाथों में धारण किए हुए, भगवान श्रीकृष्ण ने वह विराट स्वरूप प्रदर्शित किया।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना वह विश्वरूप दिखाते हैं, जो समस्त चराचर जगत का आधार है। यह दर्शन स्पष्ट करता है कि श्रीकृष्ण केवल एक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर हैं, जिनमें समस्त ब्रह्मांड स्थित है। भक्त के लिए यह संदेश है कि वह अपने सीमित दृष्टिकोण को त्यागकर प्रभु की व्यापकता को समझे और आत्मसमर्पण करे। श्रीकृष्ण का यह दिव्य रूप अहंकार के नाश का प्रतीक है, जो साधक को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है। भगवान के इस विराट दर्शन से यह स्पष्ट होता है कि वे ही सृष्टि के आदि, मध्य और अंत हैं, और उनसे भिन्न कुछ भी नहीं है।