अध्याय 13, श्लोक 2 (भगवद् गीता 13.2)

अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

संस्कृत श्लोक

श्री भगवानुवाचइदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः

लिप्यंतरण

śhrī-bhagavān uvācha idaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyate etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ

शब्दार्थ

śhrī-bhagavān uvācha—the Supreme Divine Lord said; idam—this; śharīram—body; kaunteya—Arjun, the son of Kunti; kṣhetram—the field of activities; iti—thus; abhidhīyate—is termed as; etat—this; yaḥ—one who; vetti—knows; tam—that person; prāhuḥ—is called; kṣhetra-jñaḥ—the knower of the field; iti—thus; tat-vidaḥ—those who discern the truth

अनुवाद

श्रीभगवान् ने कहा—हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' कहा जाता है, और जो इसे जानता है, उसे तत्त्वज्ञानी जन 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने अत्यंत गूढ़ रहस्य को स्पष्ट किया है कि हमारा यह भौतिक शरीर ही 'क्षेत्र' है, जो हमारे कर्मों का आधार है। योगेश्वर कृष्ण हमें यह बोध करा रहे हैं कि आत्मा इस शरीर का ज्ञाता है, जो शरीर के परिवर्तनों को देखता है किंतु उनसे लिप्त नहीं होता। इस सत्य को जानकर साधक संसार के द्वंद्वों से ऊपर उठकर अपनी नित्य चैतन्य स्वरूप में स्थित हो सकता है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, अपितु जीव के मोक्ष का मार्ग है जो उसे माया के बंधन से मुक्त कर श्री कृष्ण के चरणों तक ले जाता है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह शरीर नहीं, अपितु क्षेत्रज्ञ है, तभी वह आत्मा और परमात्मा के मिलन की पराकाष्ठा को प्राप्त करता है।

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