अध्याय 13, श्लोक 26 (भगवद् गीता 13.26)

अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

संस्कृत श्लोक

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः

लिप्यंतरण

anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate te ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ

शब्दार्थ

anye—others; tu—still; evam—thus; ajānantaḥ—those who are unaware (of spiritual paths); śhrutvā—by hearing; anyebhyaḥ—from others; upāsate—begin to worship; te—they; api—also; cha—and; atitaranti—cross over; eva—even; mṛityum—death; śhruti-parāyaṇāḥ—devotion to hearing (from saints)

अनुवाद

अन्य जो दूसरे लोग इस प्रकार स्वयं नहीं जानते, वे दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं; वे भी श्रवण के परायण होकर मृत्यु के पार हो जाते हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक में श्रवण भक्ति की अपार महिमा का वर्णन कर रहे हैं। वे समझाते हैं कि यदि कोई साधक स्वयं आत्म-साक्षात्कार न भी कर सके, तो भी संतों और शास्त्रों के वचनों पर दृढ़ विश्वास रखने मात्र से उसका कल्याण निश्चित है। जब भक्त उन दिव्य उपदेशों को ही अपना परम आश्रय मान लेता है, तो भगवान श्री कृष्ण उसे संसार रूपी मृत्यु के चक्र से मुक्त कर देते हैं। यह मार्ग दिखाता है कि श्रद्धा ही वह सेतु है जो जीव को भगवत्प्राप्ति के तट तक पहुँचाती है। इस प्रकार, केवल सुनकर की गई निष्ठावान उपासना भी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।

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