अध्याय 14, श्लोक 11 (भगवद् गीता 14.11)
संस्कृत श्लोक
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत
लिप्यंतरण
sarva-dvāreṣhu dehe ’smin prakāśha upajāyate jñānaṁ yadā tadā vidyād vivṛiddhaṁ sattvam ity uta
शब्दार्थ
sarva—all; dvāreṣhu—through the gates; dehe—body; asmin—in this; prakāśhaḥ—illumination; upajāyate—manifest; jñānam—knowledge; yadā—when; tadā—then; vidyāt—know; vivṛiddham—predominates; sattvam—mode of goodness; iti—thus; uta—certainly;
अनुवाद
जब इस देह के द्वारों अर्थात् समस्त इन्द्रियों में ज्ञानरूप प्रकाश उत्पन्न होता है, तब सत्त्वगुण को प्रवृद्ध हुआ जानो।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को सत्त्वगुण के उदय के लक्षण समझा रहे हैं, जो साधक को प्रकाश की ओर ले जाता है। जब हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ सांसारिक विषयों के भोग के बजाय ईश्वरीय ज्ञान के द्वार बन जाती हैं, तो समझना चाहिए कि हृदय में सत्त्वगुण का विस्तार हो रहा है। योगेश्वर श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि यह स्थिति आत्मा की शुद्धता और परमात्मा के प्रति समर्पण का प्रतीक है। इस दिव्य स्थिति में पहुँचकर, साधक अज्ञान के अंधकार से मुक्त होकर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से ही जीव में ऐसा विवेक जागृत होता है, जिससे वह संसार में रहकर भी नित्य सत्य को देख पाता है।