अध्याय 14, श्लोक 17 (भगवद् गीता 14.17)

अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग

संस्कृत श्लोक

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च

लिप्यंतरण

sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha pramāda-mohau tamaso bhavato ’jñānam eva cha

शब्दार्थ

sattvāt—from the mode of goodness; sañjāyate—arises; jñānam—knowledge; rajasaḥ—from the mode of passion; lobhaḥ—greed; eva—indeed; cha—and; pramāda—negligence; mohau—delusion; tamasaḥ—from the mode of ignorance; bhavataḥ—arise; ajñānam—ignorance; eva—indeed; cha—and

अनुवाद

सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है, और तमोगुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होता है।

अर्थ एवं व्याख्या

कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह दिव्य सत्य समझा रहे हैं कि कैसे प्रकृति के तीन गुण जीव की चेतना को आच्छादित करते हैं। सात्त्विक वृत्ति जहाँ ज्ञान का प्रकाश लाती है, वहीं राजसिक वृत्ति लोभ और तृष्णा के जाल में फँसाती है और तामसिक वृत्ति व्यक्ति को प्रमाद और अज्ञान के अंधकार में धकेल देती है। योगेश्वर कृष्ण का यह उपदेश एक साधक को आत्म-निरीक्षण करने के लिए प्रेरित करता है ताकि वह इन गुणों के मायाजाल से ऊपर उठ सके। भक्त जब निरंतर भगवान श्री कृष्ण का आश्रय लेता है, तो वह इन तीनों गुणों के प्रभाव से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है। यह ज्ञान मनुष्य को उस शाश्वत आनंद की ओर ले जाने वाला मार्ग है, जो केवल पूर्ण शरणागति से प्राप्त होता है।

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