अध्याय 14, श्लोक 18 (भगवद् गीता 14.18)
संस्कृत श्लोक
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः
लिप्यंतरण
ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ jaghanya-guṇa-vṛitti-sthā adho gachchhanti tāmasāḥ
शब्दार्थ
ūrdhvam—upward; gachchhanti—rise; sattva-sthāḥ—those situated in the mode of goodness; madhye—in the middle; tiṣhṭhanti—stay; rājasāḥ—those in the mode of passion; jaghanya—abominable; guṇa—quality; vṛitti-sthāḥ—engaged in activities; adhaḥ—down; gachchhanti—go; tāmasāḥ—those in the mode of ignorance
अनुवाद
सत्त्वगुण में स्थित पुरुष ऊर्ध्व लोकों को जाते हैं, रजोगुणी पुरुष मध्य में स्थित रहते हैं और तमोगुण के कार्यों में लीन तामस लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि मनुष्य की चेतना ही उसके भविष्य का निर्धारण करती है। जिस प्रकार का गुण हमारे अंतःकरण में प्रधान होता है, आत्मा वैसी ही गति को प्राप्त करती है। श्री कृष्ण का यह उपदेश हमें सचेत करता है कि यदि हम अपनी जीवन-शैली में सात्त्विकता का संवर्धन करें, तो हम निश्चित ही परम पद की ओर अग्रसर हो सकते हैं। सांसारिक मोह और अधोगति से बचने का एकमात्र उपाय योगेश्वर श्री कृष्ण की शरण में जाकर अपने स्वभाव को पवित्र बनाना है। यह सत्य शाश्वत है कि हमारी प्रवृत्तियाँ ही हमारी मुक्ति या बंधन का कारण बनती हैं।