अध्याय 14, श्लोक 2 (भगवद् गीता 14.2)
संस्कृत श्लोक
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च
लिप्यंतरण
idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti cha
शब्दार्थ
idam—this; jñānam—wisdom; upāśhritya—take refuge in; mama—mine; sādharmyam—of similar nature; āgatāḥ—having attained; sarge—at the time of creation; api—even; na—not; upajāyante—are born; pralaye—at the time of dissolution; na-vyathanti—they will not experience misery; cha—and
अनुवाद
जो इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (साधर्म्य) को प्राप्त हो गए हैं, वे सृष्टि के आदि में न तो जन्म लेते हैं और न ही प्रलयकाल में व्याकुल होते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को उस परम अवस्था का बोध करा रहे हैं, जहाँ जीव जन्म-मरण के चक्र से पूर्णतः मुक्त हो जाता है। जब भक्त भगवान श्री कृष्ण के दिव्य ज्ञान को आत्मसात कर उनके स्वरूप में स्थित हो जाता है, तो वह काल के प्रभाव से परे हो जाता है। प्रलय और सृष्टि का चक्र केवल उन आत्माओं को प्रभावित करता है जो अज्ञानता में बद्ध हैं, परंतु कृष्ण-भक्त उनकी नित्य सत्ता में लीन हो जाते हैं। योगेश्वर कृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो उनकी शरण में आ जाते हैं, वे संसार की सीमाओं से परे होकर अक्षय मोक्ष को प्राप्त करते हैं। यह दिव्य स्थिति ही समस्त दुखों की अंतिम निवृत्ति है और भक्त का अपने आराध्य के साथ शाश्वत मिलन है।