अध्याय 14, श्लोक 8 (भगवद् गीता 14.8)

अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग

संस्कृत श्लोक

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत

लिप्यंतरण

tamas tv ajñāna-jaṁ viddhi mohanaṁ sarva-dehinām pramādālasya-nidrābhis tan nibadhnāti bhārata

शब्दार्थ

tamaḥ—mode of ignorance; tu—but; ajñāna-jam—born of ignorance; viddhi—know; mohanam—illusion; sarva-dehinām—for all the embodied souls; pramāda—negligence; ālasya—laziness; nidrābhiḥ—and sleep; tat—that; nibadhnāti—binds; bhārata—Arjun, the son of Bharat

अनुवाद

हे अर्जुन! तू तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जान; यह समस्त देहधारियों को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अज्ञान के उस अंधकारमय स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं, जो आत्मा की चेतना को ढक लेता है। योगेश्वर कृष्ण हमें सचेत करते हैं कि तमोगुण केवल आलस्य नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जाल है जो जीव को भगवद-भक्ति के मार्ग से भटका देता है। प्रमाद, आलस्य और निद्रा के माध्यम से यह गुण मनुष्य की विवेक शक्ति को क्षीण कर देता है, जिससे वह माया के बंधन में जकड़ा रहता है। भगवान श्री कृष्ण का यह संदेश समस्त मानवता के लिए है कि अज्ञान के इस अंधकार को पहचानकर ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। जब साधक श्री कृष्ण के प्रति समर्पित होकर सचेत होता है, तभी वह इस जड़ता के बंधन से मुक्त हो सकता है।

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