अध्याय 14, श्लोक 9 (भगवद् गीता 14.9)
संस्कृत श्लोक
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत
लिप्यंतरण
sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata jñānam āvṛitya tu tamaḥ pramāde sañjayaty uta
शब्दार्थ
sattvam—mode of goodness; sukhe—to happiness; sañjayati—binds; rajaḥ—mode of passion; karmaṇi—toward actions; bhārata—Arjun, the son of Bharat; jñānam—wisdom; āvṛitya—clouds; tu—but; tamaḥ—mode of ignorance; pramāde—to delusion; sañjayati—binds; uta—indeed
अनुवाद
हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में आसक्त करता है और रजोगुण कर्म में, किन्तु तमोगुण ज्ञान को ढंककर प्रमाद में आसक्त कर देता है।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से जीव को माया के तीन गुणों के प्रभाव से अवगत करा रहे हैं। योगेश्वर कृष्ण समझाते हैं कि सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण आत्मा को भौतिक संसार से बांधने वाले बंधन हैं। जहाँ सत्त्व सुख की लालसा और रज कर्मों की भागदौड़ में उलझाता है, वहीं तमोगुण मनुष्य की विवेक-शक्ति को ढककर उसे आलस्य और अज्ञान के गहरे अंधकार में डाल देता है। भगवान श्री कृष्ण का संकेत स्पष्ट है कि जब तक जीव इन तीनों गुणों के परे नहीं जाता, तब तक उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। अनन्य भक्ति और श्री कृष्ण की शरण में जाकर ही साधक इन गुणों के मायाजाल से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप को जान सकता है।