अध्याय 17, श्लोक 13 (भगवद् गीता 17.13)
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
संस्कृत श्लोक
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते
लिप्यंतरण
vidhi-hīnam asṛiṣhṭānnaṁ mantra-hīnam adakṣhiṇam śhraddhā-virahitaṁ yajñaṁ tāmasaṁ parichakṣhate
शब्दार्थ
vidhi-hīnam—without scriptural direction; asṛiṣhṭa-annam—without distribution of prasādam; mantra-hīnam—with no chanting of the Vedic hymns; adakṣhiṇam—with no remunerations to the priests; śhraddhā—faith; virahitam—without; yajñam—sacrifice; tāmasam—in the mode of ignorance; parichakṣhate—is to be considered
अनुवाद
शास्त्रविधि से रहित, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों, बिना दक्षिणा और बिना श्रद्धा के किये हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को तामसी वृत्तियों से उत्पन्न कर्मों के लक्षण समझा रहे हैं। योगेश्वर कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो यज्ञ शास्त्रों के नियमों का पालन नहीं करता और जिसमें श्रद्धा तथा दान का अभाव होता है, वह केवल अंधकार का विस्तार है। प्रभु का यह संदेश मानवता के लिए एक चेतावनी है कि बिना सात्विक भाव और शास्त्र सम्मत विधि के किया गया कोई भी कार्य आत्मा को बंधन में ही डालता है। श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं कि भक्ति और निष्ठा ही कर्म को पवित्र बनाती है। जो साधक अपने जीवन को प्रभु की आज्ञा और धर्म के अनुरूप ढाल लेता है, वही अज्ञान के अंधकार से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।