अध्याय 17, श्लोक 19 (भगवद् गीता 17.19)

अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग

संस्कृत श्लोक

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्

लिप्यंतरण

mūḍha-grāheṇātmano yat pīḍayā kriyate tapaḥ parasyotsādanārthaṁ vā tat tāmasam udāhṛitam

शब्दार्थ

mūḍha—those with confused notions; grāheṇa—with endeavor; ātmanaḥ—one’s own self; yat—which; pīḍayā—torturing; kriyate—is performed; tapaḥ—austerity; parasya—of others; utsādana-artham—for harming; vā—or; tat—that; tāmasam—in the mode of ignorance; udāhṛitam—is described to be

अनुवाद

जो तप मूढ़तापूर्वक स्वयं को पीड़ित करते हुए अथवा अन्य लोगों के नाश के लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।

अर्थ एवं व्याख्या

कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से तप के उस स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं जो अज्ञानता से प्रेरित है। वे अर्जुन को सावधान करते हुए कहते हैं कि जब तप का उद्देश्य स्वयं को व्यर्थ की यातना देना या दूसरों का अहित करना होता है, तब वह तप अन्धकारमय बन जाता है। श्रीकृष्ण के अनुसार, ऐसा तामसिक तप मनुष्य को परमात्मा से दूर ले जाता है और उसके अहंकार को और अधिक पुष्ट करता है। एक साधक को यह स्मरण रखना चाहिए कि भगवद्प्राप्ति का मार्ग प्रेम, विवेक और आत्म-शुद्धि से होकर जाता है, न कि हिंसा या मूर्खतापूर्ण हठ से। भगवान श्रीकृष्ण की यह दिव्य वाणी हमें सिखाती है कि हमारी हर क्रिया का आधार सात्त्विक होना अनिवार्य है।

Read this verse in English