अध्याय 17, श्लोक 21 (भगवद् गीता 17.21)
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
संस्कृत श्लोक
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्
लिप्यंतरण
yat tu pratyupakārārthaṁ phalam uddiśhya vā punaḥ dīyate cha parikliṣhṭaṁ tad dānaṁ rājasaṁ smṛitam
शब्दार्थ
yat—which; tu—but; prati-upakāra-artham—with the hope of a return; phalam—reward; uddiśhya—expectation; vā—or; punaḥ—again; dīyate—is given; cha—and; parikliṣhṭam—reluctantly; tat—that; dānam—charity; rājasam—in the mode of passion; smṛitam—is said to be
अनुवाद
जो दान प्रत्युपकार की भावना से, फल की इच्छा रखकर या क्लेशपूर्वक दिया जाता है, उसे राजस दान कहा गया है।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से हमें दान के उस स्वरूप से सावधान कर रहे हैं जो अहंकार और स्वार्थ से लिप्त है। जब हम प्रतिफल की आशा रखकर या भारी मन से दान करते हैं, तो वह कर्म हमें संसार के बंधन में ही जकड़ता है। योगेश्वर कृष्ण यह शिक्षा देते हैं कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए दान सात्विक होना चाहिए, न कि राजसी चकाचौंध या कामनाओं से भरा हुआ। जो भक्त निष्काम भाव से और प्रसन्न चित्त होकर दान करता है, वही श्री कृष्ण की कृपा का पात्र बनता है। यह शिक्षा साधक को अपने भीतर के विकारों को त्यागकर शुद्ध भाव से सेवा करने का दिव्य मार्ग दिखाती है।