अध्याय 17, श्लोक 8 (भगवद् गीता 17.8)
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
संस्कृत श्लोक
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः
लिप्यंतरण
āyuḥ-sattva-balārogya-sukha-prīti-vivardhanāḥ rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛidyā āhārāḥ sāttvika-priyāḥ
शब्दार्थ
āyuḥ sattva—which promote longevity; bala—strength; ārogya—health; sukha—happiness; prīti—satisfaction; vivardhanāḥ—increase; rasyāḥ—juicy; snigdhāḥ—succulent; sthirāḥ—nourishing; hṛidyāḥ—pleasing to the heart; āhārāḥ—food; sāttvika-priyāḥ—dear to those in the mode of goodness
अनुवाद
आयु, सत्त्व (शुद्धि), बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को प्रवृद्ध करने वाले, तथा रसयुक्त, स्निग्ध, स्थिर और मन को प्रसन्न करने वाले भोजन सात्त्विक मनुष्यों को प्रिय होते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि साधक का आहार ही उसकी चेतना का आधार बनता है। सात्त्विक भोजन न केवल शरीर को पुष्ट करता है, बल्कि वह मन को भी भगवद्भक्ति के अनुकूल बनाता है, जो मोक्ष प्राप्ति के लिए अनिवार्य है। योगेश्वर कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो वस्तुएं शरीर में शुद्धता और शांति का संचार करती हैं, वही वास्तव में आत्मा की उन्नति में सहायक हैं। अपने आहार को सात्त्विक बनाकर, भक्त अपने भीतर उस दैवीय गुणों को विकसित करता है जो उसे परमात्मा के निकट ले जाते हैं। यह साक्षात् श्री कृष्ण का निर्देश है कि भौतिक जगत में रहते हुए भी मनुष्य को विवेकपूर्ण जीवन शैली अपनाकर स्वयं को निरंतर पवित्र रखना चाहिए।