अध्याय 18, श्लोक 14 (भगवद् गीता 18.14)
संस्कृत श्लोक
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्
लिप्यंतरण
adhiṣhṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ cha pṛithag-vidham vividhāśh cha pṛithak cheṣhṭā daivaṁ chaivātra pañchamam
शब्दार्थ
adhiṣhṭhānam—the body; tathā—also; kartā—the doer (soul); karaṇam—senses; cha—and; pṛithak-vidham—various kinds; vividhāḥ—many; cha—and; pṛithak—distinct; cheṣhṭāḥ—efforts; daivam—Divine Providence; cha eva atra—these certainly are (causes); pañchamam—the fifth
अनुवाद
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण कर्म की सिद्धि के पाँच कारणों का वर्णन कर रहे हैं, जो मनुष्य के प्रत्येक कार्य के पीछे निहित हैं। भगवान यह समझा रहे हैं कि अहंकारवश स्वयं को ही एकमात्र कर्ता मानना अज्ञान है, क्योंकि शरीर, मन और इन्द्रियां तो केवल उपकरण हैं। जब भक्त यह समझ जाता है कि दैवी शक्तियों का अनुग्रह ही इन क्रियाओं को संभव बनाता है, तो उसका अहंकार गलने लगता है। श्रीकृष्ण हमें सिखाते हैं कि संसार में कर्म करते हुए भी, फल की आसक्ति को त्यागकर, स्वयं को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देना ही मुक्ति का मार्ग है। यह बोध साधक को कर्मबंधन से मुक्त करता है और उसे निरंतर श्रीकृष्ण की शरण में स्थित रहने की प्रेरणा देता है।