अध्याय 18, श्लोक 39 (भगवद् गीता 18.39)
संस्कृत श्लोक
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्
लिप्यंतरण
yad agre chānubandhe cha sukhaṁ mohanam ātmanaḥ nidrālasya-pramādotthaṁ tat tāmasam udāhṛitam
शब्दार्थ
yat—which; agre—from beginning; cha—and; anubandhe—to end; cha—and; sukham—happiness; mohanam—illusory; ātmanaḥ—of the self; nidrā—sleep; ālasya—indolence; pramāda—negligence; uttham—derived from; tat—that; tāmasam—in the mode of ignorance; udāhṛitam—is said to be
अनुवाद
जो सुख आरम्भ में और परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होने वाला सुख तामस कहा जाता है।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को उस मायावी सुख के प्रति सचेत कर रहे हैं, जो आत्मा को अज्ञानता के अंधकार में धकेल देता है। योगेश्वर कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि आलस्य और प्रमाद से उपजा यह सुख क्षणिक तो क्या, अपितु आत्मा को उसके दिव्य स्वरूप से पूरी तरह विमुख कर देता है। यह सुख न केवल वर्तमान में, बल्कि भविष्य में भी जीव के पतन का कारण बनता है, जिससे मोक्ष का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण हमें यह शिक्षा दे रहे हैं कि इंद्रिय-सुख के छलावे में पड़कर प्रमाद में डूबने के बजाय, जीव को अपनी चेतना को जागृत रखना चाहिए। यह ज्ञान मनुष्य को जड़ता के बंधन से मुक्त होकर परम ब्रह्म की प्राप्ति की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है।