अध्याय 18, श्लोक 48 (भगवद् गीता 18.48)
संस्कृत श्लोक
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः
लिप्यंतरण
saha-jaṁ karma kaunteya sa-doṣham api na tyajet sarvārambhā hi doṣheṇa dhūmenāgnir ivāvṛitāḥ
शब्दार्थ
saha-jam—born of one’s nature; karma—duty; kaunteya—Arjun, the son of Kunti; sa-doṣham—with defects; api—even if; na tyajet—one should not abandon; sarva-ārambhāḥ—all endeavors; hi—indeed; doṣheṇa—with evil; dhūmena—with smoke; agniḥ—fire; iva—as; āvṛitāḥ—veiled
अनुवाद
हे अर्जुन, मनुष्य को अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म को दोषयुक्त होने पर भी त्यागना नहीं चाहिए, क्योंकि धुएँ से ढकी अग्नि के समान सभी कर्म किसी न किसी दोष से आवृत रहते हैं, ऐसा भगवान श्री कृष्ण का कथन है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण, जो स्वयं परमेश्वर हैं, अर्जुन को स्वधर्म के पालन का शाश्वत रहस्य समझा रहे हैं। वे उपदेश देते हैं कि इस भौतिक जगत में कोई भी कर्म पूर्णतः दोषरहित नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे अग्नि के साथ धुआँ सदैव रहता है। भगवान श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं कि अपने कर्मों को फल की इच्छा के बिना केवल उनकी प्रसन्नता के लिए अर्पित करना ही मोक्ष का मार्ग है। जब भक्त अपने स्वभावगत कर्तव्यों को ईश्वर की सेवा मानकर करता है, तो वह कर्म के बंधनों से मुक्त हो जाता है। अतः श्री कृष्ण का यह आदेश मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक दिव्य मार्गदर्शन है।