अध्याय 18, श्लोक 5 (भगवद् गीता 18.5)
संस्कृत श्लोक
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्
लिप्यंतरण
yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṁ kāryam eva tat yajño dānaṁ tapaśh chaiva pāvanāni manīṣhiṇām
शब्दार्थ
yajña—sacrifice; dāna—charity; tapaḥ—penance; karma—actions; na—never; tyājyam—should be abandoned; kāryam eva—must certainly be performed; tat—that; yajñaḥ—sacrifice; dānam—charity; tapaḥ—penance; cha—and; eva—indeed; pāvanāni—purifying; manīṣhiṇām—for the wise
अनुवाद
यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि उन्हें अवश्य करना चाहिए; क्योंकि यज्ञ, दान और तप तो मनीषियों को पवित्र करने वाले हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्म कभी त्याज्य नहीं होते, क्योंकि ये आत्मा को शुद्ध करने वाले साधन हैं। ये कर्म साधक के अंत:करण से अज्ञानता और मलिनता को दूर कर उसे प्रभु की प्राप्ति के योग्य बनाते हैं। जब मनुष्य इन कर्मों को अहंकार रहित होकर केवल भगवान श्री कृष्ण की प्रसन्नता के लिए करता है, तो वे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। योगेश्वर कृष्ण हमें सिखाते हैं कि संसार में रहते हुए कर्तव्य का पालन करना ही सच्ची साधना है। ये पवित्र कर्म न केवल बुद्धि को निर्मल करते हैं, बल्कि साधक को ईश्वर के चरणों में समर्पित होने की प्रेरणा भी देते हैं।